*लोचन लोलुप इन्दु-वदन का, कर्ण कांक्षी मृदु-वाणी का* - *हृदय अभिलषित प्रेम-वारिधि रूप-राग-हठ मानी का*

शनिवार, 26 मार्च 2016

प्रतीक्षा – ४

सखि, तू ही रे...

सखि ! निशा घनी पर नींद नहीं,
फिर भी, विरही मन दुखी नहीं,
क्या तू भी कह ! जगी नहीं...

किसकी छवि है, उर इन्दु सँवारे, गगन विहारे, ये रजनी रे,
सखि, तू ही रे...

ये अंग लगी, ये दूर खड़ी,
हा ! हास-रुदन ये घड़ी-घड़ी,
क्या तू न जली, हाँ आई बड़ी...

किसकी गति है, कवि संत विचारें, पपीह पुकारे, पिय रे पी रे,
सखि, तू ही रे...

सखि, हो तू मैं मैं तू लें प्रण,
हाँ तुझसे ही यह जीवन,
मैं तू क्या हाँ भ्रमर-सुमन...

किसकी खुशबू, ये मलय-सुधा रे, अनिल पसारे, धीरे-धीरे,
सखि, तू ही रे...

मंगलवार, 3 मार्च 2015

...इक रंग यह भी...होली ही है...

(१)

दोस्त ग़म-ख्वारी में मेरी सअई फरमावेंगे क्या...
जख्म के भरने तलक, नाखूं न बढ़ जावेंगे क्या...
...हज़ारों मिन्नतें
माथे टिकाए सारे ही दर पे,
दिखाया ख़ूब दुनिया को - मेरा चंदा सलोना है...
बनेगा खूब अफसर, नाम रोशन बाप का होगा...
बना भी...
आह !
कब माँ की दुआओं को खुदा भी टाल सकता था...
वो बरबस आज भी ऐसी दुआएं रोज करती है,
बढ़े नित्
ओहदे-दर-ओहदे...
अगरचे दूर बैठा है...

(२)

बेनियाजी हद से गुजरी बंदा-परवर कब तलक...
हम कहेंगे हाल-ए-दिल और आप फरमावेंगे क्या...

...ये अलसाया समय-पाखी
क्यों है इस बार जल्दी में ?
अभी बातें हुईं थीं फोन पर नवरात में ही तो
गया संकरांत, शिवराति, लो होली आन बैठी है...
बनाएगी वो पूए, हाँ भले लगते हैं बाबु को
सोचती है कटहल की बने सब्जी भी तो अच्छा
कहाँ शहरों में ऐसे स्वाद घरवाले मयस्सर हैं...

अरे ! परसाल बाबु ने मगर वो तो न खाए थे
जाने क्या कहा था कि बहु ने कि ‘इलरजी’ है...
...शिफत है...
मांग हो ओहदे की शायद,
वरना बाबु को...?

(३)

आज वाँ तेग-ओ-कफ़न बांधे हुए जाता हूँ मैं...
उज्र मेरे क़त्ल करने में भी वो लावेंगे क्या...
है रुतबेदार ओहदा,
सो न छुट्टी मिल सके शायद...
बुलाते बाबु तो हाँ ‘ये’ हवा-पानी बदल आते,
अदद टीभी यहाँ, ख़बरें वही बासी-तिरासी हैं...
करो मनुहार
या बक्को
‘इनकी’ तो बस हूं.उह्हूँ
रहेंगे चुप्पी ओढ़े तो सुनेंगे ऊँचा ही फिर ना...

(४)

...गरज क्या लाट से,
दो-चार बातें बाप से कर लें,
मगर बिज़ी हैं साहब शोहदों संग पीने-खाने में...
अभी भी फोन पर बस...
पासबुक अपडेट कर लीजै !
महीने के...खरचे के...रुपय्ये...भेज डाले हैं...
...करम है I
...जवानी-भर कमाया आन सो
एडजस्ट करते हैं I

(५)

...नैन दो आसमां कोरे कई बादल घुमड़ते हैं...
ढरकती है...
सिमट जाती है...
बारिश...
उसके आँचल से...
जाने ! क्या लिखा पढ़ती जमीं का, ऊबकर कहती
उठूँ,
संझा की बाती बार लूं फिर गूँथ लूं आटा...

बूढ़ऊ का आज का दिन भी फ़कत दो चाय में बीता...

रविवार, 27 जुलाई 2014

आशियाँ



अपने आशियाँ को कब तवक्को खार-ओ-गुल की हो
शज़र इक जोश-ए-उम्मीदी वो झड़ता टूटता सपना

ये मौसम और दो जलवे कि सबके डोलते ईमाँ
पहले आबतर गेसू तेरे फिर यूँ ज़रा कंपना

खुशा! दिल का किया सौदा तिजारत खूब की मैंने
लिए गम दे के हर खुशियाँ लुटाया दो-जहाँ अपना

वो आते क्यूँ लिए पत्थर मेरे घर शहर वाले
उसी की देन मशहूरी बना जो राजदाँ अपना

ख़बर क्या थी कि सारे राह-रौ इतने अनाड़ी थे
दिखती हर तरफ़ मंजिल जो छूटा कारवाँ अपना

बुधवार, 21 अगस्त 2013


तेरी संजीदगी मुझको इस तरह सताती है,
कि मैं बेसाख्ता से कहकहे ताबीर करता हूँ I

भला क्योंकर हरा रक्खे है कोई अपने ज़ख्मों को,
जिगर के पार तेरे तंज के सब तीर करता हूँ I

खज़ाना अश्क का मेरा, न रहजन डाल दें डाका,
हिफाज़त में तेरी तल्खी को मैं शमशीर करता हूँ I

ये तूने साथ क्या छोड़ा मुझसे कारवां छूटा,
मुक़द्दर अब सफ़र मंजिल फकत तदबीर करता हूँ I

गुजर जाना है मुझको वक्त की मानिंद, पर रह ले
तेरा हर जिक्र कायम सो मैं ये तहरीर करता हूँ I

सोमवार, 27 मई 2013

एक (दिल के) रोगी की (सं)वेदना


मेरा
नाम लिक्खा पहले...नाजुकी से
फिर क्यूँ
मुस्कुरा गई
...हाय डॉक्टर

खुद को आईने में देख...पूछा
मेरे
आने का सबब
...हाय डॉक्टर

अब गुमशुदा है मेरे दिल की धड़कन
जब से...आला
हटा गई
...हाय डॉक्टर

कल मस हुए थे शब में हाथ-से-हाथ
आज
पट्टी चढ़ा गई
...हाय डॉक्टर

अदना सी ज़िक्र दिल की नश्तरी पे,
चीड-फाड़
सुझा गई
...हाय डॉक्टर

वो दिल के टुकड़े कर दे
करम होगा
हर टुकड़ा...सदा देगा
...हाय डॉक्टर

वो दवा बनें मेरे दर्द-ए-दिल का
मैं...
दुआ करूँगा
...हाय डॉक्टर

रविवार, 10 मार्च 2013

प्रतीक्षा-३


युगारंभ से पूर्व घटित, उस पहले-परिचय-विनिमय की
नेत्रों के अगणित प्रश्नों की, अस्फुट वार्ता के संचय की,

वह प्रेम कथा प्रति-वार पढ़ी, फिर दुहराई, फिर तिहराई...

अयि सखि सहचरी,
क्यों सपनों में तू आई...

प्रति-पल निरख रहा तुम आतीं,  सहमीं, संभली, सकुचाई

अयि सखि सहचरी
क्यों सपनों में तू आई...

वे दृग-द्वय, दृग मूँदूं, दृग-प्राण बने, दृग खोलूं दृग-मीत,
कितनी स्मृति संभार किये, कितने रस अभिनीत,

क्या-क्या भाव भरे वे दृग-द्वय, शीतल, मंजुल, सुखदायी...

अयि सखि सहचरी...

बता प्रेम-पथ करी ठिठोली, शासित की उडुगण की चाल,
किन्तु, लोक-जन क्यों कह हँसते, “गहन निशा, पाषाण उछाल”,

सारे खेल अनूठे तुझसे, रास, रोष अब रुस्वाई...

अयि सखि सहचरी...

अमीय प्रेम-रस पिये हुए मैं, विरह हलाहल कंठ रखूँ,
               अब ये मद-मय स्वप्न-सोम का, चषक हाथ में, इन्हें चखूँ

कितनी छटा बिखरती तुझसे, धवल, धूम्र अब अरुणाई...

अयि सखि सहचरी...

रहा स्वप्न में, रही सुसुप्ति, या जाग्रत मुझको कब बोध,
क्षेत्र-काल आयाम बिखरते सब, अब कैसा अवरोध,

सब तुरीय...
सब तुरीय, तू प्रणव-नाद सी हंसती, खिलती, मुस्काई...

अयि सखि सहचरी...

बुधवार, 23 जनवरी 2013

आदमी

वाईज की कही सबने सुनी खूब की तौबा

कहते फिरे हर मर्ज में मसला है आदमी

कहते फिरे, पर किसको कहा भूले नीमचंद
पहला जो था, पिछला भी था, अगला है आदमी  

हाँ, सच है, उसमे तुझको हर इक रंग दिखेंगे,
पानी पे खिलती धूप-सा उजला है आदमी

क्यों तल्खी न हो, ताब न हो, रंज-ओ-गम न हो
सुनते है हम भी, खुल्द से निकला है आदमी

कुछ मानिये मेरी, यूं तगाफुल न कीजिये
गोया कि गल्तियो का पुतला है आदमी

वो अब्र है ये अश्क़ है, ये शाख वो शज़र
गर ग़ज़ल है खुदा तो मतला है आदमी