*लोचन लोलुप इन्दु-वदन का, कर्ण कांक्षी मृदु-वाणी का* - *हृदय अभिलषित प्रेम-वारिधि रूप-राग-हठ मानी का*

मंगलवार, 3 मार्च 2015

...इक रंग यह भी...होली ही है...

(१)

दोस्त ग़म-ख्वारी में मेरी सअई फरमावेंगे क्या...
जख्म के भरने तलक, नाखूं न बढ़ जावेंगे क्या...
...हज़ारों मिन्नतें
माथे टिकाए सारे ही दर पे,
दिखाया ख़ूब दुनिया को - मेरा चंदा सलोना है...
बनेगा खूब अफसर, नाम रोशन बाप का होगा...
बना भी...
आह !
कब माँ की दुआओं को खुदा भी टाल सकता था...
वो बरबस आज भी ऐसी दुआएं रोज करती है,
बढ़े नित्
ओहदे-दर-ओहदे...
अगरचे दूर बैठा है...

(२)

बेनियाजी हद से गुजरी बंदा-परवर कब तलक...
हम कहेंगे हाल-ए-दिल और आप फरमावेंगे क्या...

...ये अलसाया समय-पाखी
क्यों है इस बार जल्दी में ?
अभी बातें हुईं थीं फोन पर नवरात में ही तो
गया संकरांत, शिवराति, लो होली आन बैठी है...
बनाएगी वो पूए, हाँ भले लगते हैं बाबु को
सोचती है कटहल की बने सब्जी भी तो अच्छा
कहाँ शहरों में ऐसे स्वाद घरवाले मयस्सर हैं...

अरे ! परसाल बाबु ने मगर वो तो न खाए थे
जाने क्या कहा था कि बहु ने कि ‘इलरजी’ है...
...शिफत है...
मांग हो ओहदे की शायद,
वरना बाबु को...?

(३)

आज वाँ तेग-ओ-कफ़न बांधे हुए जाता हूँ मैं...
उज्र मेरे क़त्ल करने में भी वो लावेंगे क्या...
है रुतबेदार ओहदा,
सो न छुट्टी मिल सके शायद...
बुलाते बाबु तो हाँ ‘ये’ हवा-पानी बदल आते,
अदद टीभी यहाँ, ख़बरें वही बासी-तिरासी हैं...
करो मनुहार
या बक्को
‘इनकी’ तो बस हूं.उह्हूँ
रहेंगे चुप्पी ओढ़े तो सुनेंगे ऊँचा ही फिर ना...

(४)

...गरज क्या लाट से,
दो-चार बातें बाप से कर लें,
मगर बिज़ी हैं साहब शोहदों संग पीने-खाने में...
अभी भी फोन पर बस...
पासबुक अपडेट कर लीजै !
महीने के...खरचे के...रुपय्ये...भेज डाले हैं...
...करम है I
...जवानी-भर कमाया आन सो
एडजस्ट करते हैं I

(५)

...नैन दो आसमां कोरे कई बादल घुमड़ते हैं...
ढरकती है...
सिमट जाती है...
बारिश...
उसके आँचल से...
जाने ! क्या लिखा पढ़ती जमीं का, ऊबकर कहती
उठूँ,
संझा की बाती बार लूं फिर गूँथ लूं आटा...

बूढ़ऊ का आज का दिन भी फ़कत दो चाय में बीता...

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