*लोचन लोलुप इन्दु-वदन का, कर्ण कांक्षी मृदु-वाणी का* - *हृदय अभिलषित प्रेम-वारिधि रूप-राग-हठ मानी का*

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

हाँ ! लडूँगा मैं

(१)
‘उनको प्रणाम’
आज लब्धि ‘बाबा’ की रचना,
फूटा चित्तोद्गार,
किया फिर साश्रु समापन
लक्ष्य-भ्रष्ट, हम,
क्या पहिचाने कर्माधिपति !
यद्यपि
करते “मा फलेषु” का प्रतिपल चिंतन

किन्तु म्लान मन
देख
अध:गति और अशुचिता
इस युग में
चहुँओर
भांति-भांति सम्पूजित...

वहीं
दृष्टिगत महामना
चिर एकाकी से,
जिनकी अभ्यर्थना आज तक
रही अपूरित

प्रत्युत निवेदना
निकष-सरीखे-मानवता की,
सदा बनाये रखें, भाव-समर्पण-निश्छल,
दुःख-दैन्य सुलभ
जो पूंजीभूत वो
पूर्वफलों से,
न्याय-परायण ईश दयानिधि हैं
सुत-वत्सल

कह लो अबोध पर
है दुर्बोध
मुझे यह निष्ठा
ज्वार हृदय-उदधि में,
क्यों तुम पाओ प्रतिष्ठा

कैसा शासन ईश्, हाय !
यह कैसी विसंगति
सारे
लौकिक-भोग-विलास उन्हें
जो दुर्मति


          (२)

अस्वीकार मुझको
हँ ! ये कलुष दर्शन
परलोक-सुख मौलिक,
वृथा
यह दत्त-जीवन !!

इक मनोरथ यहकि
तुम
सहाय्य रहना...
समझो मोद व्रत,
वसन भक्ति,
त्याग गहना,

(३)

असमता क्यों धरा पर ? तुम कहो
हे साम्ब शंकर !
सुना है सत्य हो
आनन्द हो
तुम ही प्रलयंकर

ऋजु आत्म को, अनिवार्य भी क्यों अलभ हैं ?
जो वक्र हैं, उनको मिले वैभव निराले
न सोहें क्षीर-पायस श्वान को यदि धात्र अनगढ़
बिलखते भूख से बच्चे कहाँ दे माँ निवाले ?
असेवित,
मंच पर कुछ पात्र अक्षम हैं, निबल हैं
कोटिशः हाथ पाएँ बाहुबलि जयघोष वाले
दिया क्यों मान इतना फिर
उन्हीं भस्मासुरों को
क्यों नि:स्पृह बने, दे लोभियों को कुँजी-ताले !
हो निरुपाय
ले पर्याय बैठे ‘दानी औढर’
या है सत्य शिव,
तुमने
‘वृषभ-औ-व्याल’ पाले...

(४)

किंचित
श्रृंग-पुच्छ-विहीन-पशु-बल,
तुम्हें घेरे,
पाखण्ड
‘हों..-जूँ..’ चल रहा
पर, मुँह-अँधेरे,
जलपात्र-कर शुचिस्नात मनुसुत
खड़ा सम्मुख
सत्य-सुन्दर सब समेटे,
पर,
अधोमुख...!

आर्त् इसकी सुनो-
उस...
तुमुलध्वनि को दो मति तुम
...अथवा-
सिद्ध कर लो नाम अपना ‘पशुपति’ तुम !

(५)

उत्पन्न मंथन का हलाहल पीने वाले...
विषमता का महाविष
...यहाँ
नि:सृत हो रहा है...
उपेक्षित सत्य भू पर,
और वो कैलाश-वासी
चढ़ाये कितव-विजया हाय रे !
क्यों सो रहा है

यदि
धर्म धोए पाप
पार्थिव वा अपार्थिव
फिर रहें अच्युत
त्रिपथगा
तव शीश पर शिव

कैसा क्षमा-याचन ?
धृष्ट कह लो, तुम,
परन्तु,
लख तेरी असमता,
हुए
झंकृत हृदय-तंतु...

नैवेद्य-ज्योति-पुष्प-चन्दन
सब समर्पित
पर अनुग्रह-वन्दना ?
अब भूल जाओ...
बस यही अभिदेय तुमको
हे महीश्वर !
अन्यथा स्वयं धन-पिपासु भक्त लाओ

(६)

भिन्न मैं कब भला इन आडम्बरों से
चाहूँ प्रशस्ति मैं भी अपने अनुचरों से
दुर्भाव उनके लिए, ‘न’ हो सम्मति में,
कुब्भाखवक्ता अथच केवल असहमति में

‘रूद्र’ हो तुम,
क्यों ?
रुदन सारे अटल हैं
स्वार्थपूरित आत्म
अनगढ़ हैं,
विकल हैं !

हे ईश, दो आशीष मुझको
तुम सँवारो
या...
कर नेत्र-त्रय का लक्ष्य
मुझको
अब उबारो...

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011

प्रतीक्षा-2

लब्धि अपेक्षित चलो नहीं,
पर दुःख की कोई बात नहीं...

प्रिये...
वृथा विरह की रात नहीं

इन रातों की जागी आँखें बातें करती,
सपने बुन-बुन

फिर ओढेंगे बीते कल को, आ मृदुल करें,
काँटें चुन-चुन

रूठें भी तो हो वजह नई, 
बीती हो, 
कोई बात नहीं..

प्रिये, 
वृथा विरह की रात नहीं...


देखो ना, साथी बन बैठे मेरे, 
नभ के, सारे तारे,  

वे तुमसे मिलने को आतुर, अनुनय करते,
प्यारे-प्यारे,

वे कहते हैं, चंदा तो है, पर,
उसमे, तुम-सी बात नहीं...

प्रिये,
वृथा विरह की रात नहीं...

इस अमानिशा के सागर को मैं, नाव
प्रतीक्षा की लेकर,

पार करूँगा, प्रण है ये, सुस्मृति
पतवारों से खेकर,

हाँ, दृग आर्द्र रहें जब तक
अरुणाभ क्षितिज होगा,

पर दुसह-दूरियों में होता, कब
लोचन-जल-पात नहीं...

प्रिये...



शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

प्रतीक्षा

शुभ रात्रि प्रिये,

मैं निंद्रा-पथ पर बाट जोहता,
स्वप्न लुटाती तुम आना

पलकों-पलकों प्रणय-प्रसंगों की भाषा
तुम समझाना

विरही मन क्या ठौर भला,
कुछ सोच मुदित वह होता है...

वहीं अकिंचन सहसा लेकिन
सिसक सिसक कर रोता है

इस हास-रुदन का हर्ष-व्यथा का मर्म मुझे
तुम बतलाना

पलकों-पलकों......................

रहा अनुर्वर सार दिवस का,
फिरा किया मैं स्मृति-वन में,

यद्यपि जाग्रत पर विरही
मैं,जड़-सा कब था चेतन में

सुप्ति-जागरण, जड़-चेतन, ये पृथक कहाँ !
तुम सिखलाना

पलकों-पलकों.....

वाणी-सदृश समीर, विधु मुख,
रात्रि अंक, कह सोता है,

अद्भुत मन का वैषम्य,
वियोगी अधिक विलासी होता है

तव विलास, वैभव प्रकृति का, भिन्न कहाँ
पर? बतलाना

पलकों-पलकों....

मेरे अवर सचिव श्री चंद्रकांत जी रावत की नज़र

साहेब की शीरीं बातें, साहेब ही के तगाफुल,
सुहबत न उनकी होती, कब मिजाह निगार होता

हम ही रखें संभाले, उनकी तल्खी उनकी शोखी,
हम सा जहाँ में दीगर कोई खरीदार होता

खुद भी है वो मुसाहिब क्योंकर भरम ये खुलता,
गर न राह-रौ हमारा वो सु-ए-दार होता

तपिश-ए-रवानी-ए-खूँ, हम ज़ब्त ही न रखते,
हर बैत इस ग़ज़ल का बर्क-ओ-शरार होता

हम भी हुनर दिखाते, अपनी बाँकपन का हरसू
गर न आतिश-ए-कलम का तालिब CR होता...