*लोचन लोलुप इन्दु-वदन का, कर्ण कांक्षी मृदु-वाणी का* - *हृदय अभिलषित प्रेम-वारिधि रूप-राग-हठ मानी का*

गुरुवार, 20 सितंबर 2012


कब ज़िन्दगी को हमने रुलाते हुए देखा
जर्रा-गुबारे-शिकवा आँखों में गया शायद |

क्या गुमाँ करेंगे, ये शाने-फ़ित्नाशाही
गोया हो रही है शम्मा से हया शायद |

फिर यूं बिखर रही है, लबे-बाम से फरेबी
दीदावर नए हैं, जल्वा है नया शायद |

है ये भी लाज़िमी कि दर्द नया-सा हो
सूरत बहाल होगी, ईजादे-दवा शायद |

क्यों ना कफ़स में ही इक आसमां बनायें
है लुत्फ़े-ज़िन्दगी ही, लुत्फ़े-कज़ा शायद |