*लोचन लोलुप इन्दु-वदन का, कर्ण कांक्षी मृदु-वाणी का* - *हृदय अभिलषित प्रेम-वारिधि रूप-राग-हठ मानी का*

बुधवार, 21 अगस्त 2013


तेरी संजीदगी मुझको इस तरह सताती है,
कि मैं बेसाख्ता से कहकहे ताबीर करता हूँ I

भला क्योंकर हरा रक्खे है कोई अपने ज़ख्मों को,
जिगर के पार तेरे तंज के सब तीर करता हूँ I

खज़ाना अश्क का मेरा, न रहजन डाल दें डाका,
हिफाज़त में तेरी तल्खी को मैं शमशीर करता हूँ I

ये तूने साथ क्या छोड़ा मुझसे कारवां छूटा,
मुक़द्दर अब सफ़र मंजिल फकत तदबीर करता हूँ I

गुजर जाना है मुझको वक्त की मानिंद, पर रह ले
तेरा हर जिक्र कायम सो मैं ये तहरीर करता हूँ I