शुभ रात्रि प्रिये,
मैं निंद्रा-पथ पर बाट जोहता,
स्वप्न लुटाती तुम आना
पलकों-पलकों प्रणय-प्रसंगों की भाषा
तुम समझाना
विरही मन क्या ठौर भला,
कुछ सोच मुदित वह होता है...
वहीं अकिंचन सहसा लेकिन
सिसक सिसक कर रोता है
इस हास-रुदन का हर्ष-व्यथा का मर्म मुझे
तुम बतलाना
पलकों-पलकों......................
रहा अनुर्वर सार दिवस का,
फिरा किया मैं स्मृति-वन में,
यद्यपि जाग्रत पर विरही
मैं,जड़-सा कब था चेतन में
सुप्ति-जागरण, जड़-चेतन, ये पृथक कहाँ !
तुम सिखलाना
पलकों-पलकों.....
वाणी-सदृश समीर, विधु मुख,
रात्रि अंक, कह सोता है,
अद्भुत मन का वैषम्य,
वियोगी अधिक विलासी होता है
तव विलास, वैभव प्रकृति का, भिन्न कहाँ
पर? बतलाना
पलकों-पलकों....