*लोचन लोलुप इन्दु-वदन का, कर्ण कांक्षी मृदु-वाणी का* - *हृदय अभिलषित प्रेम-वारिधि रूप-राग-हठ मानी का*

शनिवार, 26 मार्च 2016

प्रतीक्षा – ४

सखि, तू ही रे...

सखि ! निशा घनी पर नींद नहीं,
फिर भी, विरही मन दुखी नहीं,
क्या तू भी कह ! जगी नहीं...

किसकी छवि है, उर इन्दु सँवारे, गगन विहारे, ये रजनी रे,
सखि, तू ही रे...

ये अंग लगी, ये दूर खड़ी,
हा ! हास-रुदन ये घड़ी-घड़ी,
क्या तू न जली, हाँ आई बड़ी...

किसकी गति है, कवि संत विचारें, पपीह पुकारे, पिय रे पी रे,
सखि, तू ही रे...

सखि, हो तू मैं मैं तू लें प्रण,
हाँ तुझसे ही यह जीवन,
मैं तू क्या हाँ भ्रमर-सुमन...

किसकी खुशबू, ये मलय-सुधा रे, अनिल पसारे, धीरे-धीरे,
सखि, तू ही रे...

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