*लोचन लोलुप इन्दु-वदन का, कर्ण कांक्षी मृदु-वाणी का* - *हृदय अभिलषित प्रेम-वारिधि रूप-राग-हठ मानी का*

शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

एक याद

सन्देश संध्या का सुना तो, चला दिनकर कर समेटे,
था श्रांति-सुख शीतल समीरण से मिला तरु तले लेते;
क्लांत तन मन ताप हरने, बनी वसुधा ही बिछावन,
हाँ, पूर्वत: निज-कर्म कर की अर्चना थी मधुर पावन;
थे स्मृति-पटल पर क्या, तुम्हारे संग बीते पल सुहाने,
लो, खिची मुस्कान-रेखा तुम दिखीं सजी सत्वर लगी आने;
आह्लादित, बहकी, तरंगित, बनी रजनी सहचरी-सी,
आ रही आशा-भरी, विकल, सहमी, स्पंदनों से भी डरी-सी;
भर अंक निज मुझको, रची माया, सुनाया गीत नि:स्वर,
हर्षिता तुम, मैं प्रफ्फुलित, सुन अभीप्सित गीत सुखकर;
की पार तब तमलीन जग मधु चन्द्र किरणों में नहा,
लो निशा भी ढलने चली पर क्षणिक था वह सुख अहा!
जब ही चहकती उषा आई तुम न जाने क्यों हुई गुम,
री नींद! कह फिर भला कब आओगी तुम, आओगी तुम.....