तेरी
संजीदगी मुझको इस तरह सताती है,
कि
मैं बेसाख्ता से कहकहे ताबीर करता हूँ I
भला
क्योंकर हरा रक्खे है कोई अपने ज़ख्मों को,
जिगर
के पार तेरे तंज के सब तीर करता हूँ I
खज़ाना
अश्क का मेरा, न रहजन डाल दें डाका,
हिफाज़त
में तेरी तल्खी को मैं शमशीर करता हूँ I
ये
तूने साथ क्या छोड़ा मुझसे कारवां छूटा,
मुक़द्दर
अब सफ़र मंजिल फकत तदबीर करता हूँ I
गुजर
जाना है मुझको वक्त की मानिंद, पर रह ले
तेरा
हर जिक्र कायम सो मैं ये तहरीर करता हूँ I
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