*लोचन लोलुप इन्दु-वदन का, कर्ण कांक्षी मृदु-वाणी का* - *हृदय अभिलषित प्रेम-वारिधि रूप-राग-हठ मानी का*

रविवार, 10 मार्च 2013

प्रतीक्षा-३


युगारंभ से पूर्व घटित, उस पहले-परिचय-विनिमय की
नेत्रों के अगणित प्रश्नों की, अस्फुट वार्ता के संचय की,

वह प्रेम कथा प्रति-वार पढ़ी, फिर दुहराई, फिर तिहराई...

अयि सखि सहचरी,
क्यों सपनों में तू आई...

प्रति-पल निरख रहा तुम आतीं,  सहमीं, संभली, सकुचाई

अयि सखि सहचरी
क्यों सपनों में तू आई...

वे दृग-द्वय, दृग मूँदूं, दृग-प्राण बने, दृग खोलूं दृग-मीत,
कितनी स्मृति संभार किये, कितने रस अभिनीत,

क्या-क्या भाव भरे वे दृग-द्वय, शीतल, मंजुल, सुखदायी...

अयि सखि सहचरी...

बता प्रेम-पथ करी ठिठोली, शासित की उडुगण की चाल,
किन्तु, लोक-जन क्यों कह हँसते, “गहन निशा, पाषाण उछाल”,

सारे खेल अनूठे तुझसे, रास, रोष अब रुस्वाई...

अयि सखि सहचरी...

अमीय प्रेम-रस पिये हुए मैं, विरह हलाहल कंठ रखूँ,
               अब ये मद-मय स्वप्न-सोम का, चषक हाथ में, इन्हें चखूँ

कितनी छटा बिखरती तुझसे, धवल, धूम्र अब अरुणाई...

अयि सखि सहचरी...

रहा स्वप्न में, रही सुसुप्ति, या जाग्रत मुझको कब बोध,
क्षेत्र-काल आयाम बिखरते सब, अब कैसा अवरोध,

सब तुरीय...
सब तुरीय, तू प्रणव-नाद सी हंसती, खिलती, मुस्काई...

अयि सखि सहचरी...

1 टिप्पणी: