युगारंभ
से पूर्व घटित, उस पहले-परिचय-विनिमय की
नेत्रों के अगणित
प्रश्नों की, अस्फुट वार्ता के संचय की,
वह
प्रेम कथा प्रति-वार पढ़ी, फिर दुहराई, फिर तिहराई...
अयि
सखि सहचरी,
क्यों सपनों में तू
आई...
प्रति-पल
निरख रहा तुम आतीं, सहमीं, संभली, सकुचाई…
अयि
सखि सहचरी
क्यों सपनों में
तू आई...
वे
दृग-द्वय, दृग मूँदूं, दृग-प्राण बने, दृग खोलूं दृग-मीत,
कितनी स्मृति
संभार किये, कितने रस अभिनीत,
क्या-क्या
भाव भरे वे दृग-द्वय, शीतल, मंजुल, सुखदायी...
अयि
सखि सहचरी...
बता
प्रेम-पथ करी ठिठोली, शासित की उडुगण की चाल,
किन्तु, लोक-जन
क्यों कह हँसते, “गहन निशा, पाषाण उछाल”,
सारे
खेल अनूठे तुझसे, रास, रोष अब रुस्वाई...
अयि
सखि सहचरी...
अमीय
प्रेम-रस पिये हुए मैं, विरह हलाहल कंठ रखूँ,
अब ये मद-मय स्वप्न-सोम का, चषक हाथ
में, इन्हें चखूँ
कितनी
छटा बिखरती तुझसे, धवल, धूम्र अब अरुणाई...
अयि
सखि सहचरी...
रहा
स्वप्न में, रही सुसुप्ति, या जाग्रत मुझको कब बोध,
क्षेत्र-काल आयाम
बिखरते सब, अब कैसा अवरोध,
सब
तुरीय...
सब
तुरीय, तू प्रणव-नाद सी हंसती, खिलती, मुस्काई...
अयि
सखि सहचरी...
Bahut achcha...
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