*लोचन लोलुप इन्दु-वदन का, कर्ण कांक्षी मृदु-वाणी का* - *हृदय अभिलषित प्रेम-वारिधि रूप-राग-हठ मानी का*

बुधवार, 23 जनवरी 2013

आदमी

वाईज की कही सबने सुनी खूब की तौबा

कहते फिरे हर मर्ज में मसला है आदमी

कहते फिरे, पर किसको कहा भूले नीमचंद
पहला जो था, पिछला भी था, अगला है आदमी  

हाँ, सच है, उसमे तुझको हर इक रंग दिखेंगे,
पानी पे खिलती धूप-सा उजला है आदमी

क्यों तल्खी न हो, ताब न हो, रंज-ओ-गम न हो
सुनते है हम भी, खुल्द से निकला है आदमी

कुछ मानिये मेरी, यूं तगाफुल न कीजिये
गोया कि गल्तियो का पुतला है आदमी

वो अब्र है ये अश्क़ है, ये शाख वो शज़र
गर ग़ज़ल है खुदा तो मतला है आदमी