कब
ज़िन्दगी को हमने रुलाते हुए देखा
जर्रा-गुबारे-शिकवा
आँखों में गया शायद
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क्या
गुमाँ करेंगे, ये शाने-फ़ित्नाशाही
गोया
हो रही है शम्मा से हया शायद |
फिर
यूं बिखर रही है, लबे-बाम से फरेबी
दीदावर
नए हैं, जल्वा है नया शायद
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है
ये भी लाज़िमी कि दर्द नया-सा हो
सूरत
बहाल होगी, ईजादे-दवा शायद
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क्यों
ना कफ़स में ही इक आसमां बनायें
है
लुत्फ़े-ज़िन्दगी ही, लुत्फ़े-कज़ा शायद |