लब्धि अपेक्षित चलो नहीं,
पर दुःख की कोई बात नहीं...
प्रिये...
वृथा विरह की रात नहीं
इन रातों की जागी आँखें बातें करती,
सपने बुन-बुन
फिर ओढेंगे बीते कल को, आ मृदुल करें,
काँटें चुन-चुन
रूठें भी तो हो वजह नई,
बीती हो,
कोई बात नहीं..
प्रिये,
वृथा विरह की रात नहीं...
देखो ना, साथी बन बैठे मेरे,
नभ के, सारे तारे,
वे तुमसे मिलने को आतुर, अनुनय करते,
प्यारे-प्यारे,
वे कहते हैं, चंदा तो है, पर,
उसमे, तुम-सी बात नहीं...
प्रिये,
वृथा विरह की रात नहीं...
इस अमानिशा के सागर को मैं, नाव
प्रतीक्षा की लेकर,
पार करूँगा, प्रण है ये, सुस्मृति
पतवारों से खेकर,
हाँ, दृग आर्द्र रहें जब तक
अरुणाभ क्षितिज होगा,
पर दुसह-दूरियों में होता, कब
लोचन-जल-पात नहीं...
प्रिये...