अपने आशियाँ को कब तवक्को खार-ओ-गुल की हो
शज़र इक जोश-ए-उम्मीदी वो झड़ता टूटता सपना
ये मौसम और दो जलवे कि सबके डोलते ईमाँ
पहले आबतर गेसू तेरे फिर यूँ ज़रा कंपना
खुशा! दिल का किया सौदा तिजारत खूब की मैंने
लिए गम दे के हर खुशियाँ लुटाया दो-जहाँ अपना
वो आते क्यूँ लिए पत्थर मेरे घर शहर वाले
उसी की देन मशहूरी बना जो राजदाँ अपना
ख़बर क्या थी कि सारे राह-रौ इतने अनाड़ी थे
दिखती
हर तरफ़ मंजिल जो छूटा कारवाँ अपना