*लोचन लोलुप इन्दु-वदन का, कर्ण कांक्षी मृदु-वाणी का* - *हृदय अभिलषित प्रेम-वारिधि रूप-राग-हठ मानी का*

बुधवार, 21 अगस्त 2013


तेरी संजीदगी मुझको इस तरह सताती है,
कि मैं बेसाख्ता से कहकहे ताबीर करता हूँ I

भला क्योंकर हरा रक्खे है कोई अपने ज़ख्मों को,
जिगर के पार तेरे तंज के सब तीर करता हूँ I

खज़ाना अश्क का मेरा, न रहजन डाल दें डाका,
हिफाज़त में तेरी तल्खी को मैं शमशीर करता हूँ I

ये तूने साथ क्या छोड़ा मुझसे कारवां छूटा,
मुक़द्दर अब सफ़र मंजिल फकत तदबीर करता हूँ I

गुजर जाना है मुझको वक्त की मानिंद, पर रह ले
तेरा हर जिक्र कायम सो मैं ये तहरीर करता हूँ I

सोमवार, 27 मई 2013

एक (दिल के) रोगी की (सं)वेदना


मेरा
नाम लिक्खा पहले...नाजुकी से
फिर क्यूँ
मुस्कुरा गई
...हाय डॉक्टर

खुद को आईने में देख...पूछा
मेरे
आने का सबब
...हाय डॉक्टर

अब गुमशुदा है मेरे दिल की धड़कन
जब से...आला
हटा गई
...हाय डॉक्टर

कल मस हुए थे शब में हाथ-से-हाथ
आज
पट्टी चढ़ा गई
...हाय डॉक्टर

अदना सी ज़िक्र दिल की नश्तरी पे,
चीड-फाड़
सुझा गई
...हाय डॉक्टर

वो दिल के टुकड़े कर दे
करम होगा
हर टुकड़ा...सदा देगा
...हाय डॉक्टर

वो दवा बनें मेरे दर्द-ए-दिल का
मैं...
दुआ करूँगा
...हाय डॉक्टर

रविवार, 10 मार्च 2013

प्रतीक्षा-३


युगारंभ से पूर्व घटित, उस पहले-परिचय-विनिमय की
नेत्रों के अगणित प्रश्नों की, अस्फुट वार्ता के संचय की,

वह प्रेम कथा प्रति-वार पढ़ी, फिर दुहराई, फिर तिहराई...

अयि सखि सहचरी,
क्यों सपनों में तू आई...

प्रति-पल निरख रहा तुम आतीं,  सहमीं, संभली, सकुचाई

अयि सखि सहचरी
क्यों सपनों में तू आई...

वे दृग-द्वय, दृग मूँदूं, दृग-प्राण बने, दृग खोलूं दृग-मीत,
कितनी स्मृति संभार किये, कितने रस अभिनीत,

क्या-क्या भाव भरे वे दृग-द्वय, शीतल, मंजुल, सुखदायी...

अयि सखि सहचरी...

बता प्रेम-पथ करी ठिठोली, शासित की उडुगण की चाल,
किन्तु, लोक-जन क्यों कह हँसते, “गहन निशा, पाषाण उछाल”,

सारे खेल अनूठे तुझसे, रास, रोष अब रुस्वाई...

अयि सखि सहचरी...

अमीय प्रेम-रस पिये हुए मैं, विरह हलाहल कंठ रखूँ,
               अब ये मद-मय स्वप्न-सोम का, चषक हाथ में, इन्हें चखूँ

कितनी छटा बिखरती तुझसे, धवल, धूम्र अब अरुणाई...

अयि सखि सहचरी...

रहा स्वप्न में, रही सुसुप्ति, या जाग्रत मुझको कब बोध,
क्षेत्र-काल आयाम बिखरते सब, अब कैसा अवरोध,

सब तुरीय...
सब तुरीय, तू प्रणव-नाद सी हंसती, खिलती, मुस्काई...

अयि सखि सहचरी...

बुधवार, 23 जनवरी 2013

आदमी

वाईज की कही सबने सुनी खूब की तौबा

कहते फिरे हर मर्ज में मसला है आदमी

कहते फिरे, पर किसको कहा भूले नीमचंद
पहला जो था, पिछला भी था, अगला है आदमी  

हाँ, सच है, उसमे तुझको हर इक रंग दिखेंगे,
पानी पे खिलती धूप-सा उजला है आदमी

क्यों तल्खी न हो, ताब न हो, रंज-ओ-गम न हो
सुनते है हम भी, खुल्द से निकला है आदमी

कुछ मानिये मेरी, यूं तगाफुल न कीजिये
गोया कि गल्तियो का पुतला है आदमी

वो अब्र है ये अश्क़ है, ये शाख वो शज़र
गर ग़ज़ल है खुदा तो मतला है आदमी