तुम्हारा रूप सुन, जब विधाता ने गढ़ा
आश्वस्त था, पर चषक मदिरा के चढ़ा
या, क्षुब्ध नीरस मनु सृजन के कर्म से,
किंवा हताशा से, व्यथित गुरु-धर्म से,
मनु-आकृति, गुण-धर्म पशुता का लिए,
कह तू एक हेतु, आत्म-जीवन के लिए....
*लोचन लोलुप इन्दु-वदन का, कर्ण कांक्षी मृदु-वाणी का* - *हृदय अभिलषित प्रेम-वारिधि रूप-राग-हठ मानी का*
मंगलवार, 14 दिसंबर 2010
शुक्रवार, 19 नवंबर 2010
एक याद
सन्देश संध्या का सुना तो, चला दिनकर कर समेटे,
था श्रांति-सुख शीतल समीरण से मिला तरु तले लेते;
क्लांत तन मन ताप हरने, बनी वसुधा ही बिछावन,
हाँ, पूर्वत: निज-कर्म कर की अर्चना थी मधुर पावन;
थे स्मृति-पटल पर क्या, तुम्हारे संग बीते पल सुहाने,
लो, खिची मुस्कान-रेखा तुम दिखीं सजी सत्वर लगी आने;
आह्लादित, बहकी, तरंगित, बनी रजनी सहचरी-सी,
आ रही आशा-भरी, विकल, सहमी, स्पंदनों से भी डरी-सी;
भर अंक निज मुझको, रची माया, सुनाया गीत नि:स्वर,
हर्षिता तुम, मैं प्रफ्फुलित, सुन अभीप्सित गीत सुखकर;
की पार तब तमलीन जग मधु चन्द्र किरणों में नहा,
लो निशा भी ढलने चली पर क्षणिक था वह सुख अहा!
जब ही चहकती उषा आई तुम न जाने क्यों हुई गुम,
री नींद! कह फिर भला कब आओगी तुम, आओगी तुम.....
था श्रांति-सुख शीतल समीरण से मिला तरु तले लेते;
क्लांत तन मन ताप हरने, बनी वसुधा ही बिछावन,
हाँ, पूर्वत: निज-कर्म कर की अर्चना थी मधुर पावन;
थे स्मृति-पटल पर क्या, तुम्हारे संग बीते पल सुहाने,
लो, खिची मुस्कान-रेखा तुम दिखीं सजी सत्वर लगी आने;
आह्लादित, बहकी, तरंगित, बनी रजनी सहचरी-सी,
आ रही आशा-भरी, विकल, सहमी, स्पंदनों से भी डरी-सी;
भर अंक निज मुझको, रची माया, सुनाया गीत नि:स्वर,
हर्षिता तुम, मैं प्रफ्फुलित, सुन अभीप्सित गीत सुखकर;
की पार तब तमलीन जग मधु चन्द्र किरणों में नहा,
लो निशा भी ढलने चली पर क्षणिक था वह सुख अहा!
जब ही चहकती उषा आई तुम न जाने क्यों हुई गुम,
री नींद! कह फिर भला कब आओगी तुम, आओगी तुम.....
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