*लोचन लोलुप इन्दु-वदन का, कर्ण कांक्षी मृदु-वाणी का* - *हृदय अभिलषित प्रेम-वारिधि रूप-राग-हठ मानी का*

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

प्रतीक्षा

शुभ रात्रि प्रिये,

मैं निंद्रा-पथ पर बाट जोहता,
स्वप्न लुटाती तुम आना

पलकों-पलकों प्रणय-प्रसंगों की भाषा
तुम समझाना

विरही मन क्या ठौर भला,
कुछ सोच मुदित वह होता है...

वहीं अकिंचन सहसा लेकिन
सिसक सिसक कर रोता है

इस हास-रुदन का हर्ष-व्यथा का मर्म मुझे
तुम बतलाना

पलकों-पलकों......................

रहा अनुर्वर सार दिवस का,
फिरा किया मैं स्मृति-वन में,

यद्यपि जाग्रत पर विरही
मैं,जड़-सा कब था चेतन में

सुप्ति-जागरण, जड़-चेतन, ये पृथक कहाँ !
तुम सिखलाना

पलकों-पलकों.....

वाणी-सदृश समीर, विधु मुख,
रात्रि अंक, कह सोता है,

अद्भुत मन का वैषम्य,
वियोगी अधिक विलासी होता है

तव विलास, वैभव प्रकृति का, भिन्न कहाँ
पर? बतलाना

पलकों-पलकों....

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