साहेब की शीरीं बातें, साहेब ही के तगाफुल,
सुहबत न उनकी होती, कब मिजाह निगार होता
हम ही रखें संभाले, उनकी तल्खी उनकी शोखी,
हम सा जहाँ में दीगर कोई खरीदार होता
खुद भी है वो मुसाहिब क्योंकर भरम ये खुलता,
गर न राह-रौ हमारा वो सु-ए-दार होता
तपिश-ए-रवानी-ए-खूँ, हम ज़ब्त ही न रखते,
हर बैत इस ग़ज़ल का बर्क-ओ-शरार होता
हम भी हुनर दिखाते, अपनी बाँकपन का हरसू
गर न आतिश-ए-कलम का तालिब CR होता...
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