*लोचन लोलुप इन्दु-वदन का, कर्ण कांक्षी मृदु-वाणी का* - *हृदय अभिलषित प्रेम-वारिधि रूप-राग-हठ मानी का*

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011

प्रतीक्षा-2

लब्धि अपेक्षित चलो नहीं,
पर दुःख की कोई बात नहीं...

प्रिये...
वृथा विरह की रात नहीं

इन रातों की जागी आँखें बातें करती,
सपने बुन-बुन

फिर ओढेंगे बीते कल को, आ मृदुल करें,
काँटें चुन-चुन

रूठें भी तो हो वजह नई, 
बीती हो, 
कोई बात नहीं..

प्रिये, 
वृथा विरह की रात नहीं...


देखो ना, साथी बन बैठे मेरे, 
नभ के, सारे तारे,  

वे तुमसे मिलने को आतुर, अनुनय करते,
प्यारे-प्यारे,

वे कहते हैं, चंदा तो है, पर,
उसमे, तुम-सी बात नहीं...

प्रिये,
वृथा विरह की रात नहीं...

इस अमानिशा के सागर को मैं, नाव
प्रतीक्षा की लेकर,

पार करूँगा, प्रण है ये, सुस्मृति
पतवारों से खेकर,

हाँ, दृग आर्द्र रहें जब तक
अरुणाभ क्षितिज होगा,

पर दुसह-दूरियों में होता, कब
लोचन-जल-पात नहीं...

प्रिये...



1 टिप्पणी:

  1. ये चीत्कार !
    ये हाहाकार !
    ये संहार !!! क्यों ?

    ये संत्रास !
    ये परिहास !
    सब बदहवास ! क्यों?

    ये वारदात !
    ये मारकाट !
    सब बरबाद ! क्यों?

    प्रशासन हाय !
    नाकामी दर्शाय !
    नाकाबिल ये ! क्यों??

    देश है त्रस्त !
    लुटेरे है मस्त !
    अनाचार ज़बरदस्त ! क्यों?

    कोई तो बताये !
    कौन है सहाय!
    अब सहा न जाए ! यूं ।।

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