*लोचन लोलुप इन्दु-वदन का, कर्ण कांक्षी मृदु-वाणी का* - *हृदय अभिलषित प्रेम-वारिधि रूप-राग-हठ मानी का*

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

कसाब सरीखे दस्युओं के नाम

तुम्हारा रूप सुन, जब विधाता ने गढ़ा
आश्वस्त था, पर चषक मदिरा के चढ़ा
या, क्षुब्ध नीरस मनु सृजन के कर्म से,
किंवा हताशा से, व्यथित गुरु-धर्म से,
मनु-आकृति, गुण-धर्म पशुता का लिए,
कह तू एक हेतु, आत्म-जीवन के लिए....

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