*लोचन लोलुप इन्दु-वदन का, कर्ण कांक्षी मृदु-वाणी का* - *हृदय अभिलषित प्रेम-वारिधि रूप-राग-हठ मानी का*

बुधवार, 23 जनवरी 2013

आदमी

वाईज की कही सबने सुनी खूब की तौबा

कहते फिरे हर मर्ज में मसला है आदमी

कहते फिरे, पर किसको कहा भूले नीमचंद
पहला जो था, पिछला भी था, अगला है आदमी  

हाँ, सच है, उसमे तुझको हर इक रंग दिखेंगे,
पानी पे खिलती धूप-सा उजला है आदमी

क्यों तल्खी न हो, ताब न हो, रंज-ओ-गम न हो
सुनते है हम भी, खुल्द से निकला है आदमी

कुछ मानिये मेरी, यूं तगाफुल न कीजिये
गोया कि गल्तियो का पुतला है आदमी

वो अब्र है ये अश्क़ है, ये शाख वो शज़र
गर ग़ज़ल है खुदा तो मतला है आदमी

2 टिप्‍पणियां:

  1. यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है
    जो अपने आप पर अगर सोचता तो
    सड़कों पर पागलों की तरह घूमता होता
    और जिसने अपने घावों को
    फूंक फूक कर सुलाया है
    अपने दर्द को दर्द से ही नहलाया है
    और जिसने अपने ह्रदय की पीड़ा को
    अपनी आखों में नहीं आने दिया है
    और जिसके बीवाई पड़े पांवों से
    दुनिया के अमीर चलते हैं
    ... अन्न का
    चांदी की थाली में उपभोग करते हैं
    और जो अपने शरीर पर
    परजीवियों को पालते हुए
    दूसरे बड़े लोगों का इतिहास बनाते हुए
    इस संसार से गुम हो जाता है
    बिना अपना कोई इतिहास बनाए
    यह हाशिए के उसी आदमी की कविता है

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  2. पा कर
    सुनहरे हर्फ़ कुछ
    कैद न हो जाऊं मैं,
    मैं कोरा कागज ही रहूँ,
    गलियों में फिरता बारहा
    गर हाथ भी आऊँ कभी, उन खेलते अत्फाल के,
    जो मुझसे
    एक किश्ती बना दें,
    छोड़ दें फिर धार में,
    और
    झूमते वे लें मजा, मेरे फ़ना हो जाने तक,
    यूं, जी सकूँ मैं जिन्दगी, और बन सके पहचान कि,
    फिर कभी कोई जो पूछे,
    बोल
    क्या तेरा पता?
    मैं शान से उनको कहूँ,
    मासूम सी किलकारियां…

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