*लोचन लोलुप इन्दु-वदन का, कर्ण कांक्षी मृदु-वाणी का* - *हृदय अभिलषित प्रेम-वारिधि रूप-राग-हठ मानी का*

गुरुवार, 20 सितंबर 2012


कब ज़िन्दगी को हमने रुलाते हुए देखा
जर्रा-गुबारे-शिकवा आँखों में गया शायद |

क्या गुमाँ करेंगे, ये शाने-फ़ित्नाशाही
गोया हो रही है शम्मा से हया शायद |

फिर यूं बिखर रही है, लबे-बाम से फरेबी
दीदावर नए हैं, जल्वा है नया शायद |

है ये भी लाज़िमी कि दर्द नया-सा हो
सूरत बहाल होगी, ईजादे-दवा शायद |

क्यों ना कफ़स में ही इक आसमां बनायें
है लुत्फ़े-ज़िन्दगी ही, लुत्फ़े-कज़ा शायद |

2 टिप्‍पणियां:

  1. हर शाख मचलती है हर फूल महकता है,
    जब भी कभी गुलशन में चर्चा तेरा होता है॥

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  2. नाराज़ आँखे बोलती रही रातभर

    पर आंच न आया तुम पर -
    रहे बेखबर !


    सूखे पत्ते सी फडफडाती रही यूं ही
    और गीली आँखों ने चाँद -
    सुखाया रातभर !


    बुझी हुई आँखों से ज़िन्दगी को देखा इस कदर
    चलती हुई ज़िन्दगी को -
    पकडती रही बस रातभर !


    काँटों से ख़्वाबों ने आँखों को खूब चुभोया है
    आंसुओं ने सहलाया है पर -
    उनींदे आँखों को रातभर !


    शायद ज़िन्दगी की यही चाल है ---पता नहीं
    आंसूं और ख्वाब ने हंगामा -
    मचाया है रातभर !

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